हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट, शिमला ने आउटसोर्स भर्ती को लेकर एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि सरकार कम बजट या प्रदेश की खराब वित्तीय स्थिति का हवाला देकर लगातार आउटसोर्स भर्ती नहीं कर सकती। ऐसा करना प्रदेश के युवाओं के साथ अन्याय और उनके अधिकारों का शोषण है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि युवाओं को सम्मानजनक और समान अवसर मिलना चाहिए तथा सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
हाई कोर्ट ने सरकार को दिए कड़े निर्देश
माननीय न्यायाधीश और (यदि आदेश में अन्य न्यायाधीश का नाम बी. नेगी है तो उसी के अनुसार संशोधित करें) की खंडपीठ ने सरकार को कड़े शब्दों में निर्देश दिए कि केवल वित्तीय कठिनाइयों का बहाना बनाकर प्रदेश के युवाओं को अस्थायी रोजगार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने कहा कि सरकारी भर्तियां योग्यता और चयन प्रक्रिया के माध्यम से होनी चाहिए तथा जहां संभव हो, नियमित (स्थायी) पदों पर नियुक्तियां की जाएं।
आउटसोर्स कर्मचारियों और भविष्य की भर्तियों पर असर
बताया जा रहा है कि हिमाचल प्रदेश में वर्तमान समय में लगभग 17,114 आउटसोर्स कर्मचारी विभिन्न सरकारी विभागों में कार्यरत हैं। हाई कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद भविष्य में होने वाली सरकारी भर्तियों में स्थायी पदों पर नियुक्तियों को प्राथमिकता मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। यह फैसला प्रदेश के लाखों युवाओं के लिए राहत और उम्मीद की खबर माना जा रहा है।
अगली सुनवाई 7 जुलाई को
सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार हाई कोर्ट को यह स्पष्ट रूप से नहीं बता सकी कि वर्तमान में विभिन्न विभागों में कुल कितने आउटसोर्स कर्मचारी कार्यरत हैं। इस पर अदालत ने नाराजगी जताई। मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई को निर्धारित की गई है, जिसमें सरकार से विस्तृत जानकारी और जवाब मांगा गया है। इस मामले पर प्रदेश के युवाओं और आउटसोर्स कर्मचारियों की नजरें अब अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं।

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